Thursday, January 17, 2008
Friday, April 20, 2007
निंदा पुरान से बचे
बिगड़ी ऐसे बनती हैं
यह सही है कि बात एक दिन में नहीं बनाती, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि जब बनाती है तो बनाती ही चली जाती है। हर बार शुरुआत तो आपको ही करना
होती हैं। बुरी आदत को छोड़ने से लेकर सबके प्रति समान भाव रखने तक। पहले में और मेरा छोड़ने का अभ्यास करना होता है। यह गणित का पहदा नहीं है जो एक दिन में हासिल हो जाएगा, वरन इसके लिए आपको सब अपनों से इसकी शुरुआत करना होगी। मेरा पेन, मेरी किताब, मेरे कपडे से लेकर मेरे रिश्तों तक।
यहाँ कौन हैं तेरा
यह पंक्ति जिसकी भी है गहरे मायने रखती हैं। एक आत्मा हैं जो शरीर में इश्वर कि इच्छा तक आप में वास कराती है और शरीर दिखता हैं इसलिये उसका भौतिक स्वरूप हैं। यही स्वरूप, जो दिखता है, रिश्ते बना लेते है और हम इसके आकर्षण में ऊलझते जाते है। हम यह भूल जाते है कि हम एक शुद्ध आत्मा है और वह सब जानती है लेकिन शरीर प्रपंचों में ऊलझा देता है।
मेरा साक्षात्कार
बात ३ जून २००४ की है। में अपने जीवन के एक बुरे दौर से गुजर रहा था। दूर तक कोई उम्मीद कि कोई किरण नहीं थी। मेरे साथ कुछ उल्टा हुआ। लोगों को गुरू गोविन्द बताते है. मुझे गोविन्द ने गुरू कि राह दिखाई।
कैसे मिली राह
मैं एक किताब कि दुकान पर गया था। वहां मैं एक किताब देखी 'ब्रह्मचर्य साधना', किताब पर लेखक के स्थान पर लिखा था स्वामी शिवानन्द । मैं केवल इतना जनता था कि मैंने जो योग सीखा (मुंगेर पद्धति वह स्वामी सत्यानान्द्जी का था और मैंने व मेरी पत्नी दोनों ने सीखा था । बाद में मेरे बेटे ने भी सीखा। इसे मेरा परिवार नित्य प्रतिदिन करता भी हैं। सिर्फ ४० रुपये की पुस्तक ने पुरा जीवन बदल डाला। ३ जून २००४ को वोह पुस्तक घर में आयी और मैंने और मेरी पत्नी ने एक ही बार में उसे पढ़ ली। दोनों बेहद प्रभावित थे। सोचा पुस्तक को पूजा में रख दिया जाये और जो भी सम्पर्क में आये उसे इसकी जानकारी दीं जाये।
२० जून २००४
चुंकि में पेशे से पत्रकार हूँ और इस दिन मेरे सामने अखबार प्रबंधन ने दो प्रस्ताव रखे। या तो मुख्यमंत्री का कवरेज़ आप करे या फिर स्वामी अवाधेशानान्द्जी झाबुआ आ रहे हैं उनके साथ कवरेज़ के लिए जाये। मैंने झाबुआ जाना चुना। स्वामीजी से सबसे पहले में नईदुनिया अखबार में मिल था। मेरे जीवन में इस अखबार का आदर्श स्थान रह है और हमेशा रहेगा, क्योंकि में इससे प्रेम करता हूँ। नईदुनिया में स्वामीजी २००४ सिंहस्थ के दौरान आये थे और इसमे स्वामीजी का उदबोधन मैंने ही कवर किया था। इसलिये झाबुआ जाने का उत्साह था। वहां कवरेज़ के दौरान जो देखा वह शायद किसी को अतिरेक लगे लेकिन स्वामीजी जो कि उस समय ५५ साल के थे ८-९ फ़ीट ऊपर से कूद जाते। किसी भी भील के बच्चे को पकड़कर गोद में बिठा लेते। हर दिन देश के जिस सबसे बडे संत के बाद सारी संत बिरादरी खाना खाती, उन स्वामीजी ने एक साधारण भील मुनसिंह के घर खाना खा लिया। जो बना वो खाया। और भी कई ऎसी बातें थी जो मैंने अपने कवरेज़ के दौरान नोट की।
स्वामीजी का पहला फ़ोन
मैंने कवरेज़ २६ जून को चार पेज में छापा। स्वामीजी तब बैंकॉक में थे। ७ जुलाई को रात ११ बजे में अखबार से घर ही आया था और एक मोबाइल से मेरे मोबाइल पर फ़ोन आया।
पूछा
आप मनोज दुबे बोल रहे है,
मैंने कहा हाँ,
इस पर दूसरी ओर से पूछा गया इतनी रात मैंने आपको परेशान तो नही किया
मैंने कहा मेरे पास देर रात तक प्रेस से सम्बंधित फ़ोन आते हैं आप बताइए कौन है आप
उधर से आवाज आयी
मैं अवाधेशानंद बोल रह हूँ
कुछ क्षणों के लिए तो में स्तब्ध रह गया और करीब जमीन से मारे ख़ुशी ३ फ़ीट उछाल गया।
फिर वे बोले
सांझ को विदेश से लौटा और आपका लेख देखा, आप शब्दों के बाजीगर है,
मैंने कहा स्वामीजी आप स्वयम शब्दों को बनाते और कहते हैं आपके आगे मैं क्या मुझे तो आप दिशा बताये
स्वामीजी बोले दिल्ली आ जाओ दिशा भी दूंगा और दीक्षा भी।
में बेहद खुश पत्नी सामने ही बैठी थी। वह भी भावुक हो गई। हमारे बुरे दौर में देश के सबसे बडे संत ने हमको फ़ोन कर बुलाया।
जब सब साथ छोड़ चुके थे। रिश्ते-नातेदार हाशिये पर रख चुके थे। खैर दिल्ली बुलाया था । जेब में पैसे थे नही और स्वामीजी का आमंत्रण मैं ऐसे ही नही जाने देना चाहता था । पत्नी ने भी कहा आप हो आओ। जैसे-तैसे पैसे की व्यवस्था की और दिल्ली गया । स्वामीजी ने मेरे रुकने की व्यवस्था पहले ही कर दी थी । वाहन स्वामीजी मेरी तारीफ किये जा रहे थे और मैं शर्म में लाल हो रह था। इतनी समझ थी की मेरी स्थिति क्या है। शायद दो दिन तक उन्होने मुझे परखा। फिर ३१ जुलाई को सुबह दीक्षा देने को कहा। मुझे मालूम नहीं था क्या करना होता है। जेब में पैसे ज्यादा नहीं थे। लेकिन उन्होने शायद भांप लिया और कह दिया केवल फूल ले आना । शायद वे फूल मेरे जीवन में खुशबु बिखेरने के लिए मँगाए थे।
दीक्षा में उन्होने क्या किया यह तो याद नही, लेकिन एक मंत्र दिया । इतना जरूर याद हैं की की उन्होंने मुझे यह कहा की आज से तेरे मेरे सम्बन्ध पिता पुत्र के होते हैं. उसके बाद मुझे जीवन में कभी पीछे मुड़कर देखने की जरुरत नही पड़ी. जिसके पिता देश के १४ महामंदलेश्वारों के आचार्य हों जिन्होंने हिमालय में कड़ी तपस्या की है, उनके पुत्र को संभालने के लिए पुरी सृष्टि साथ आ गयी. अब लगने लगा था कोई साथ हो न हो मेरे गुरु हमेशा मेरे साथ है.परीक्षा देना होती है वह उन्हीं की कृपा है आज मेरे जीवन में जो कुछ भी अच्छा है सब उनकी देन है. में सभी से यह जरूर कहना चाहता हूँ की जब समय आता है तो गुरु अपने शिष्य को अपने पास बुला लेता है. हो सकता है कई लोग परेशां होंगे की उनका उद्धार कब होगा, वह निराश न हो, क्योंकि जब गुरु बुलाता है तो कोई ताकत रोक नही सकती. परेशानी का एक अर्थ है इश्वर आपकी परीक्षा ले रहा है.
महामृत्युंजय जाप
यदि भगवन शिव आपके आराध्य है तो किसी से डरने की कोई बात नही है। भगवान् शिव अपने भक्तों की पूरी रक्षा करतें है. मुझे अपने गुरु में भगवन शिव के ही दर्शन होते हैं. सो हम का अभ्यास करतें हुए यदि महामृत्युंजय का जाप किया जाता है तो भीतर शिव के दर्शन अवश्य होते है. सो हम का अर्थ है उलटी साँस लेना. अर्थात गहरी साँस लेते हुए यह आभास होना चाहिए, मानो साँस पेट से होते हुए ऊपर आ रही है, इसी प्रकार साँस छोड़ते हुए यह आभास होना चाहिए कि साँस अन्दर पेट में हो. इसका अभ्यास करते हुए यह सोचा जाए कि भागवान शिव आपके साथ है तो वे सच में भीतर विराजित हो जाते है.
योग क्यों और किसलिए
सबसे पहले आप यह जानिए कि विचार क्या है. विचार कैसे आता है और कौन विचार देता है. विज्ञान कहता है कि विचार शरीर में बन रहे रसायनों से आता है. इसलिए यह मालूम होना चाहिए कि ऐसे रसायन कैसे बने जो अच्छे विचारों को जन्म दे. योग और संगीत दो ऐसी युक्तियाँ हैं जो शरीर में बनने वाले रसायनों को ठीक कर सकती है. जहाँ तक संगीत का प्रश्न है वह कुण्डलिनी को मदमस्त कर देता है. फिर भी इसकी सीमायें है. जैसे यह दीर्घावादी तक नही रहता. दूसरा इसमें मन पर नियंत्रण नहीं रहता. जहाँ तक योग का सवाल है वह लम्बी अवधि तक शरीर के रसायनों को नियंत्रित रखता है और मनोजयी (मन पर नियंत्रण कर लेने वाला) बनाता है. इतना सब होने के बाद भी आवश्यक यह है कि इश्वर और गुरु कि कृपा हो, तभी योग करने से अच्छे विचार बनते है. प्रभुकृपा के वृत में ही जीवनचक्र चलता है. वही आपसे योग भी करते है और अच्छे विचार भी देते है. ऐसा नहीं है कि डाकू उपासक नहीं होते, लेकिन अच्छे विचार प्रभुकृपा से उनके पास नहीं आते. इसमें भी इश्वर की ही लीला है.
कब भीतर झांके
यदि मनुष्य में इश्वर के प्रति थोड़ा भी रुझान है तो उसे धीरे धीरे समझ में आता है कि संसार की रचना कैसी रची है प्रभु ने. मान लीजिये आप हिमालय में है और वहां हिमाच्छादित पर्वतों के आलावा कुछ भी नजर नहीं आता है. ऐसे ही प्रभु की ज्योत मन में जागने के बाद कुछ नजर नहीं आता है.जो दिखता है वह प्रकृति है और उसे कहते है आदिभौतिक इसी प्रकार जो भीतर बैठा है वह आदिदैवीय माना जाता हैइश्वर से ले लगने के बाद आपमें और प्रभु में जो तरंग, निशब्द संवाद के रूप में होती है उसे आदिआध्यत्मिक मन जाता है. यही होने पर भीतर झांकने की अभिलाषा अपने आप होगी।
सब तय है
मनुष्य हमेशा यह सोचता है कि उसने कुछ किया है तभी कुछ हुआ अन्यथा नहीं होता। शायद ईश्वर से प्राप्त शक्ति को वह स्वयं की है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य के हाथ में कुछ भी नहीं है. सब तय है और परमात्मा के बिना कुछ नहीं होता. हर बात का दिन तय है. क्यों कोई ९० साल तक जीता है और कोई एक दिन भी नहीं जी पाता. कहने को कारण होते है, लेकिन वह प्रारब्ध है. उसी के अनुसार सब को जीवन काटना होते है. कर्म अपनी जगह है और प्रारब्ध अपनी जगह. ऐसा नहीं कि कर्म किया ही न जाये. मजे की बात यह है कि कर्म भी ईश्वर ही आपसे कराता है. वह आपको चुनता है.
आगे हम संस्कारों पर चर्चा करेंगे...
किसे कहोगे आनंद
आनंद कई तरह से लिए जाते है। मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक. इसमें मानसिक और शारीरिक आनंद की सीमायें तय है. यह शाश्वत नहीं है. कई बार इन आनंदों के बाद ग्लानि होने लगती है. लगने लगता है कि जो सुख भोगा, वोह सीमित है. हो सकता है कि वोह सिर्फ आपको आनंद दे रहा हो किसी और को नहीं. जिस समय इसका आभास होता है आप ग्लानि से भर उठाते है. आप किसी का मजाक बने रहें है आपका आनंद है लेकिन सामने का पक्ष आनंद नहीं ले रहा है.

